फिल्म : टिंचरी माई : द अनटोल्ड स्टोरी

यह फिल्म उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध संन्यासिन और सामाजिक आन्दोलनकारी टिंचरी माई के जीवन से प्रेरित है और उनके संघर्ष, त्याग, जुझारूपन, साहस और सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई की कहानी को आधार बनाकर लिखी गई है। फिल्म का कथानक नया और समसामयिक है।
फिल्म की नायिका मेघा माथुर दिल्ली की एक आधुनिक बिन्दास युवा और एक टीवी चैनल की पत्रकार है। चैनल उसे असाधारण काम करने वाली अनजान महिलाओं को खोजकर उन पर शोधपूर्ण स्टोरी तैयार करने का काम देता है। उसे टिंचरी माई का नाम सुझाया गया है। इसमें खास रुचि न होते हुए भी वह उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाकों में जाती है। उसे टिंचरी माई के अनेक दुःखभरे किस्सों व साहस भरे संघर्षों की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं।
टिंचरी माई यानी ठगुली देवी का जन्म पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक के मंज्यूर गांव में हुआ था। छोटी उम्र में ही उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था और 13 साल की उम्र में उनका विवाह उनसे 11 साल बड़े गवाँणी गाँव के गणेशराम नवानी से हो गया। वे उन्हें अपने साथ क्वेटा ले गए। वे द्वितीय विश्वयुद्ध में शहीद हो गए, वह अकेली रह गई। वे अपने दो बच्चों को लेकर गाँव लौटीं तो कुछ समय बाद हैजे से उनके दोनों बच्चों की मृत्यु हो गई। परिवार और समाज ने न केवल उनका तिरस्कार किया, बल्कि इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने घर त्याग दिया और उस समय के पिछड़े हुए क्षेत्र कोटद्वार भाबर में आकर जोगन बन गई। अब उनके जीवन की नई लड़ाई शुरू हुई, सामाजिक सरोकारों की। टिंचरी माई ने स्वयं शिक्षित न होते हुए भी समाज में अशिक्षा को दूर करने के लिए मोटाढाक कोटद्वार में स्कूल खोला, सिगड्डी गाँव में पीने के पानी की लड़ाई लड़ी और टिंचरी जैसी बुराई के खिलाफ एक सामाजिक आन्दोलन चलाया। जिसमें उन्होंने टिंचरी बेचने वाले व्यापारी की दुकान को आग लगा दी।
हिन्दी फिल्म : ‘टिंचरी माई: द अनटोल्ड स्टोरी’
प्रोडक्शन : एन० एण्ड एन० प्रोडक्शन
प्रस्तुतकर्ता डॉ० पुष्करमोहन नैथानी
कहानी : लोकेश नवानी
निर्देशक : के०डी० उनियाल
निर्माता : नवीन नौटियाल, विनय अग्रवाल, महेश गुप्ता

उत्तराखंड में बनी फिल्म टिंचरी माई: वही फिल्म के निर्माता नवीन नौटियाल ने बताया कि ” फ़िल्म की शूटिंग बौंठ गांव, टिहरी, चोपता, उखीमठ, धारी देवी, मलेथा, देवप्रयाग संगम, बुग्गावाला, ज्वाल्पाजी, गवांणी तथा देहरादून के झंडाजी महाराज, गांधी पार्क, माल देवता, राजपुर मार्ग तथा अन्य अनेक स्थानों में हुई है। फ़िल्म में 50 से अधिक कलाकारों ने अभिनय किया है।
कार्यक्रम में मीडिया को संबोधित करते हुए फिल्म के लेखक लोकेश नवानी ने बताया कि ” टिंचरी माई यानी ठगुली देवी का जन्म पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक के मंज्यूर गांव में हुआ था। छोटी उम्र में ही उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया था और 13 साल की उम्र में उनका विवाह उनसे 11 साल बड़े गवांणी गांव के गणेशराम नवानी से हो गया। फौजी गणेशराम उन्हें अपने साथ क्वेटा ले गए। वे द्वितीय विश्वयु( में शहीद हो गए, वह अकेली रह गई। वे अपने दो बच्चों को लेकर गांव लौटीं तो कुछ समय बाद हैजे से उनके दोनों बच्चों की मृत्यु हो गई। परिवार और समाज ने न केवल उनका तिरस्कार किया, बल्कि इतना प्रताड़ित किया कि उन्होंने घर त्याग दिया और उस समय के पिछड़े हुए क्षेत्र कोटद्वार भाबर में आकर जोगन बन गईं। अब उनके जीवन की नई लड़ाई शुरू हुई, सामाजिक सरोकारों की, टिंचरी माई ने स्वयं शिक्षित न होते हुए भी समाज में निरक्षरता दूर करने के लिए मोटाढाक कोटद्वार में स्कूल खोला, सिगड्डी गांव में पीने के पानी की लड़ाई लड़ी और टिंचरी जैसी बुराई के खिलाफ़ एक सामाजिक आन्दोलन चलाया। जिसमें उन्होंने टिंचरी यानी शराब बेचने वाले माफिया की दुकान को आग लगा दी। यह फ़िल्म समाज की पितृसत्तात्मक बुनावट, स्त्री सशक्तीकरण और सामाजिक बदलाव जैसे सवालों को उठाती है।




