
मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पत्र लिखकर 5 साल पहले हुए खर्चों के हिसाब मांगा जा रहा है. विभागों को हिसाब का याद दिलाया जा रहा है. हैरत की बात यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा बार-बार कहे जाने के बाद भी आवंटित बजट का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं भेजा जा रहा है. जिसके कारण मुख्यमंत्री राहत कोष के हिसाब को तैयार करने में भी दिक्कतें आ रही हैं.
मामला मुख्यमंत्री राहत कोष से जुड़ा है. मामला कोविड-19 महामारी के दौरान विभिन्न विभागों को जारी किए गए बजट और उसके उपयोगिता प्रमाण पत्र यानी यूसी (Utilization Certificate) से संबंधित है. करीब पांच साल बीत जाने के बाद भी कई विभाग खर्च किए गए करोड़ों रुपये का पूरा हिसाब शासन को नहीं दे पाए हैं. मुख्यमंत्री कार्यालय लगातार विभागों को पत्र भेजकर याद दिला रहा है, लेकिन इसके बावजूद कई विभाग इस मामले में गंभीरता नहीं दिखा रहे.
कोविड संक्रमण अब लोगों की यादों से लगभग धुंधला पड़ चुका है, लेकिन शासन के भीतर उस दौर से जुड़ी फाइलें अब भी अधूरी हैं. महामारी के दौरान आपातकालीन परिस्थितियों में मुख्यमंत्री राहत कोष से अलग-अलग विभागों को करोड़ों रुपए जारी किए गए थे. इन पैसों का इस्तेमाल यात्रियों को उनके घर पहुंचाने, वैक्सीनेशन अभियान चलाने, अस्थायी चिकित्सालय स्थापित करने और जरूरतमंद वर्गों की सहायता जैसे कार्यों में किया गया. लेकिन इन खर्चों का अंतिम लेखा-जोखा अब तक शासन के रिकॉर्ड में पूरा नहीं हो पाया है.
दरअसल, किसी भी विभाग को जारी किए गए बजट के बाद संबंधित विभाग को यह बताना होता है कि पैसा किस काम में और किस प्रकार खर्च किया गया. इसके लिए उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी किया जाता है. यह प्रमाण पत्र वित्तीय अनुशासन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि सरकारी धन का इस्तेमाल स्वीकृत उद्देश्य के लिए ही हुआ है. वित्त विभाग और शासन इसी आधार पर खर्चों का अंतिम मिलान करते हैं.
लेकिन मुख्यमंत्री राहत कोष से जारी बजट के मामले में कई विभाग वर्षों बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए हैं. यही कारण है कि मुख्यमंत्री कार्यालय को बार-बार विभागों को पत्र लिखने पड़ रहे हैं. इन पत्रों में पुराने निर्देशों का हवाला देते हुए विभागों को याद दिलाया जा रहा है कि अब तक उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं भेजे गए हैं.
स्वास्थ्य विभाग को भी पत्र: इसी तरह स्वास्थ्य विभाग को भी मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पत्र भेजा गया है. कोविड काल में 18 से 44 वर्ष तक की आयु वर्ग के लोगों के लिए निशुल्क वैक्सीनेशन अभियान चलाया गया था. इसके अलावा अस्थायी कोविड चिकित्सालय भी स्थापित किए गए थे. इन कार्यों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से लगभग 130 करोड़ रुपए की धनराशि जारी की गई थी.
बताया गया है कि इसमें से करीब 70 करोड़ रुपए वापस कर दिए गए और 10 करोड़ रुपये के खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र शासन को सौंप दिया गया. लेकिन इसके बावजूद लगभग 50 करोड़ रुपए के खर्च का पूरा हिसाब आज तक उपलब्ध नहीं कराया गया है. स्वास्थ्य महानिदेशक को भेजे गए पत्र में मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जल्द यूसी उपलब्ध कराने को कहा है.
न्याय विभाग से से भी सामने आया मामला: मामला केवल इन दो विभागों तक सीमित नहीं है. न्याय विभाग को भी मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पत्र भेजा गया है. कोविड संक्रमण के दौरान अधिवक्ताओं की सहायता के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से करीब 60 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई थी. यह राशि बार काउंसिल ऑफ उत्तराखंड के नाम से जारी हुई थी, लेकिन अब तक इस पर भी उपयोगिता प्रमाण पत्र शासन को प्राप्त नहीं हुआ है.
इन मामलों से यह साफ दिखाई देता है कि सरकारी विभागों में वित्तीय जवाबदेही को लेकर गंभीर कमी बनी हुई है. मुख्यमंत्री कार्यालय बार-बार पत्र भेजकर विभागों को याद दिला रहा है, लेकिन उसके बावजूद सालों तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहा. इससे शासन की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
क्या कहते हैं नियम: वित्तीय नियमों के अनुसार, यदि कोई विभाग समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं देता तो आगे मिलने वाले बजट और योजनाओं की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. यही वजह है कि यूसी को सरकारी कामकाज में बेहद अहम दस्तावेज माना जाता है. लेकिन उत्तराखंड में करोड़ों रुपए के खर्च का हिसाब सालों तक लंबित रहना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है.
सवाल: सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री कार्यालय स्वयं लगातार पत्र लिख रहा था, तब भी संबंधित विभागों ने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया? क्या विभागों में रिकॉर्ड संधारण (रखरखाव) की व्यवस्था कमजोर है, या फिर अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हो पा रही.
सवाल: सवाल ये उठता है कि आखिर पांच साल तक उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित रहने पर अब तक क्या कार्रवाई की गई. मुख्यमंत्री कार्यालय के पत्रों में केवल यूसी उपलब्ध कराने की बात कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि लगातार अनदेखी करने वाले अधिकारियों या विभागों के खिलाफ कोई जवाबदेही तय हुई या नहीं.
यह पूरा मामला केवल वित्तीय दस्तावेजों की देरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन की कार्यशैली और प्रशासनिक अनुशासन की वास्तविक तस्वीर भी सामने लाता है. करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का हिसाब वर्षों तक अधूरा रहना न केवल सरकारी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाता है, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता पैदा करता है.




